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Wednesday, March 12, 2014

सदियों से चल रहा हूँ
उमीदों की राह में,
दुआओं में गा रहा हूँ
पनाह दो अपनी पनाह में.
राह के पत्थरों से कर ली
मैंने अपनी दोस्ती,
उलझनों में बहती जाती
उम्मीदों की कश्ती.
नयी शाखाओं में देखा,
हरियाली का दास्ताँ.
उलझनों में उलझ गयी है
मेरे मन की रास्ता.
छोटे छोटे छज्जो पे,
नयी धुप की छाओं है.
दूर किसी नदी में बहेती,
कश्माशों की नाव है.
लोथल पोथल लहरों में,
चंचल मन की नीव है,
मुश्किलों के करवटों में,
साहिलों का नीड है.
कदमो की आहटों को सुनती
मैं चला जाता हूँ
बेजुबान भीर में
गीत गुनगुनाता हूँ.
सदियों से चल रहा हूँ में
उमीदों की राह में
कोई नहीं तो खुद ही सही
सुनसान इस सफ़र में.
विश्वास की जड़ को मन मैं लिए
अग्निपथ पे चला जाता हूँ,
हर इंसान की मुस्कुराहटों में,
आज भी, सच्चाई देख पाता हूँ.

Tuesday, November 29, 2011

Shwetpathorer Swapno

শ্বেতপাথরের স্বপ্ন 


আমি শাহ জাহানের যমুনা 
মুমতাজ এর নিরবতা, শীতল স্মৃতির আচ্ছাদন 
আমার স্রোত কে করেছে ধীর. 
চাঁদনী রাতে শ্বেতপাথরের ছায়া,
ভালবাসার প্রতিছবি, আমার সারা গায়ের উপর,
আষ্টেপিষ্টে মোড়া উষ্ণতার চাদর.
সাক্ষী আমি, অনেক রক্তপাতের 
মুঘল মসনদের অপরাধের দলিল.


করিম মিয়ার স্বপ্ন আমি, 
পাথর কেটে যার জীবন যাপন. 
গ্রীষ্মের তাপে, গামছা ভিজিয়ে 
খেজুর গাছের নিচে, এক পলক ঘুম. 
শাহ জাহানের স্বপ্ন, করিমের দিবা-নিশি 
জেগে থাকা. 


করিম মিয়া, বরই রসিক মানুষ,
পাথর কাটতে কাটতে কত কথায় না বলত. 
চানা ভাজা আর খেজুর ছিল তার সব থেকে প্রিয়!


বিশাল অট্টালিকার মাঝে, করিম মিয়ার ছোট্ট মেয়ে আলিনা,
ছুট্টে বেরাছে করিমএর সাথে,
করিমের গায়ে নতুন জামা, পায়ে নতুন জুতো,
মেহেন্দি করা চুলে, জরির টুপি. 
আরামকেদারায় করিম মিয়া একটু বিশ্রাম নিচ্ছে,
ঠিক তক্ষনই আলিনা একটা ময়ুর পালক দিয়ে,
করিম এর কানে দিল সুরসুরি! 
খিলখিলিয়ে যেই না হাঁসে করিম, অমনী এক বেতের ঘা, 
সপাট করে পড়ল! 
করিমের স্বপ্ন ভেঙ্গে গেল. 
চোখের জলে স্বপ্নের জল ছবিটা আবার কেমন যেন আবছা হয়ে গেল.
সারা রাত করিমের ঠুক ঠাক শব্দ 
আমাকে জাগিয়ে রাখত. 


বহু বছর ধরে তৈরী হলো শাহ জাহানের তাজ মহল. 
পৃথিবীর বুকে এ যেন এক পূর্নিমার চাঁদ. 
ভালবাসার মক্কা, পৃথিবীর অষ্টম আশ্চর্য. 
সুক্ষ তার কারুকার্য, 
বহুমূল্য জহরতে মোড়া, ভালবাসার মাখ-বরাহ!
কিন্তূ করিম মিয়া কোথায় ? 
ওই গামছা ভেজা, জোড়া জীর্ণ মানুষ তা কোথায় ? 
তাকে আর দেখা যাই নি. 


আমার জলের রং লাল, 
সেই সব পারদর্শী শ্রমিকের আঙ্গুল 
আমি বয়ে নিয়ে চলেছি, 
সহস্র বছর ধরে, আমার নিরবতার প্রতিবাদ. 
আঘাত দিয়ে জয় করে নিতে চেয়েছিল শাহ জাহান, 
নির্মূল করতে চেয়েছিল সৃষ্টি কর্তাদের 
পৃথিবীর বুক থেকে মুছে দিতে চেয়েছিল তাদের অস্তিত্ব.


আজ আমি জীর্ণ 
আমার স্রোত আজ ক্ষীণ,
আজ আর দেখা যায় না, তাজ মহলের প্রতিছবি.
আমি ভুলতে বসেছি সব কিছু. 
মনে নেই আমার মুমতাজএর চেহারা 
মনে নেই আমার শাহ জাহানের দাপট 
মনে নেই আমার ঔরান্গাজেবএর নাশকতা 
মনে আছে সুধু করিম মিয়ার ভেজা গামছা,
চানা আর খেজুর এর নাস্তা,
মনে আছে স্বপ্নের মধেই আলিনার ছেলেখেলার গল্প,
মনে আছে, মধ্য রাতের ক্রন্ধন,
মনে আছে, ছেনির ঠুক ঠাক!


আমি জানি, এই তাজ মহল করিম মিয়ার 
আমি জানি, এই যমুনার তীরে 
কোনো এক খেজুর গাছের নিচে 
বৃদ্ধ করিম স্বপ্ন দেখছে!


- রাম কমল

Wednesday, September 28, 2011

Dugga Pujo - Bengali Poem

দুগ্গা পুজো 

আগমনী বার্তা এলো 
আকাশ জুড়ে আলোর খেলা 
দুগ্গা ঠাকুর আসবে বলে 
সবুজ ঘাসে মজার মেলা 
নতুন জামা, নতুন জুতো,
পুজোর ভিড়ে বেদম গুতো.

মাটির মায়ের মাটির মানুষ 
দুঃখ, জ্বালা হাউই ফানুস 
ঢাকের ওপর পড়বে কাঠি 
বাজবে কাসর ঘন্টা, 
খিলখিলিয়ে হাঁসব সবাই 
শুনব বিজয় ধংকা.

মহিষাসুর মরবে আবার,
মরবে সকল জরা,
শিউলি ফুলের গন্ধে ভাসে,
সকল জগত সারা. 
নাচব আমি নাচবে তুমি, 
নাচব ঢাকের ছন্দে,
করব সবাই মস্তি মজা 
মাতব যে আনন্দে. 

চপ, কচুরি, ফুচকা লুচি 
থাকবে সবই লিস্ট-এ 
চাউমিন আর চিল্লি চিচ্কেন 
প্রধান হবে ফিস্ট-এ.
সপ্তমী তে ঠাকুর দেখা, 
অস্তমি তে গরম ভোগ. 
নবমী তে মাংস কষা; 
দশমী তে রাজার ভোজ.

বিজয়া তে বিষন্ন মন 
দুগ্গা যাবে ফিরে, 
আসবে আবার বছর ঘুরে 
আনন্দলোক ঘিরে. 
ঢাকের তালে নাচব আবার,
বাজবে কাসর ঘন্টা, 
দশভূজার আহবানে 
শুদ্ধ হবে মনটা. 

Safar - Hindi poem

सदियों से चल रहा हूँ

उमीदों की राह में,


दुआओं में गा रहा हूँ


पनाह दो अपनी पनाह में.


राह के पत्थरों से कर ली


मैंने अपनी दोस्ती,


उलझनों में बहती जाती


उम्मीदों की कश्ती.


नयी शाखाओं में देखा,


हरियाली का दास्ताँ.


उलझनों में उलझ गयी है


मेरे मन की रास्ता.


छोटे छोटे छज्जो पे,


नयी धुप की छाओं है.


दूर किसी नदी में बहेती,


कश्माशों की नाव है.


लोथल पोथल लहरों में,


चंचल मन की नीव है,


मुश्किलों के करवटों में,


साहिलों का नीड है.


कदमो की आहटों को सुनती


मैं चला जाता हूँ


बेजुबान भीर में


गीत गुनगुनाता हूँ.


सदियों से चल रहा हूँ में


उमीदों की राह में


कोई नहीं तो खुद ही सही


सुनसान इस सफ़र में.


विश्वास की जड़ को मन मैं लिए


अग्निपथ पे चला जाता हूँ,


हर इंसान की मुस्कुराहटों में,


आज भी, सच्चाई देख पाता हूँ.

Tuesday, September 27, 2011

Tarpan - In the name of departed soul


Today is Mahalaya.
This day is considered as one of the most auspicious day in Hindu calender. The day marks the end of 'pitri paksh' and beginning of 'devi paksh'. On this day, people pray for the departed soul of their parents. This ritual is predominant in eastern part of India, precisely in Bengal and Orissa. This ritual is popularly known as "Tarpan".
Across the Hindu religion it is believed that after death, the soul incarnates into a new form and embodies as animal, bird, reptile, human or any other form depending on the Karmas (deeds) in one’s past life. Thus, as one’s ancestors would have attained a new form after death, many people believe that why is Pitr-Puja necessary. It is obligatory in Hindu tradition.

As according to Bhagwad Gita : "Just as one removes old clothes and puts on new ones, so does the Jivatma abandon an old body and obtain a new one"
Thus, it is only the house and body that the soul changes, but whatever we as children are indebted to our ancestors should be repaid, because the soul never dies. The pitr-puja performed by the sons and grandchildren in memory of their ancestors, is preceded with the thought that: "O Pitrs in whichever form you may be, wherever you may be, we wish to remember and pray for your peace and welfare".
I lost my dad, two years ago. The first year, somehow I didn't feel like doing 'Tarpan', I don't know why, but I skipped the ritual. I guess, it took time for me to believe that he is no more with me. I mentally refused to do anything that would kill my faith, that he is dead. I was behaving like a child. I guess, every child is a child when it comes to their own parents. I remember, as a kid, my Baba would obediently follow all the rituals and pray for my grandfather's soul. As kids, we used to hardly understand the significance of this day. For us, it used to be Durga Puja countdown. We would think of holidays, puja shopping, pandal hopping and eating out at various food joints. The importance of puja or tarpan donned on me, much later.
As a kid, I would see my Baba getting ready before sunrise on the day of Mahalaya. He would drape a white dhoti, wear a white kurta and a new "poite" (sacred thread). He would take a holy dip, in the ghats of Ganges and then pray for his father and grandfather's soul. While coming back, he would bring piping hot samosas (shingaras) kachoris, alu rasa, sandesh for everyone at home. That day, we would have traditional breakfast.
The morning would start early on the day of Mahalaya. Baba would wake up around 4 am, and wake me and my brother from deep sleep. He would switch on the radio, while my Ma would be fast asleep. She would hear the radio from her bed, half-asleep. We would hear the immortal voice of BirendraKrishna Bhadro, reciting Sri Sri Chandi. Frankly speaking, the thought of it gives me goosebumps even today. His recitation would create an ambiance which would filter all sorts of negativity around us. The air would get purified with his crystal clear voice. We would stare at the radio and imagine the visuals of Goddess Durga fighting the demons and killing Mahisasura with Trishul (Pointed Weapon). Those were my early childhood days.
Few years later when we had a television set (black and white, of course), and Doordarshan started showing 'Mahisasurmardini' on the day of Mahalaya. The show would start immediately after the radio transmission of BirendraKrishna Bhadro's show. Baba would switch the TV on, and meanwhile we had to brush our teeth, take a shower and get ready for the puja. This used to be our regular ritual on the day of Mahalaya.
Baba practiced this ritual till his last year. He stopped visiting Ganges, after his first heart attack. Doctor's advised him to be careful. The cold river water was not advisable for a heart patient. But he would still pray for his forefathers on the day of Mahalaya. He would take an early morning bath, and execute the entire procedure in our puja room. I have seen such discipline in him, which I don't have. I don't think, I will ever be able to match up to his dedication and honesty.
Baba is no more. I am staying in Mumbai, with my wife. It's going to be a decade, since I have moved out from Kolkata. Now I am working in a film production company. We don't have holidays on Mahalaya and Durga Puja. In fact, very few people in this state observe this day as "father's day". Living in this city, has rubbed some influence in me, too. But somehow, this year, I felt that I must pray for my father's soul. I don't know why, I had his urge from within.
It was a sheer coincidence that a dear friend of mine, mentioned that I should pray for my father. She mentioned that, on this day, the soul returns to bless their sons and daughters. I argued with her, saying that does this really matter? Well, I guess it matters.
I don't know the procedure of 'tarpan' but I did what my heart said. I offered him sweets, til, flowers and diya. I prayed for him, I prayed for his soul and peace. While praying for him, I was remembering those lovely memories from childhood. I had a lump in my throat. Eyes moist, I thought about him, with my eyes shut. I realized that he is no more with me, physically. I realized that, I have replaced him, it's my turn to pay tribute to my forefathers. I remembered, how smartly he taught me with his own deeds. How he wanted me to follow, the tradition of 'tarpan'. He never forced anything on me, still with his own discipline, he. managed to teach all of us, a lesson.
I know, he is around. I know, he is seeing me from the clouds. I know, he is happy, wherever he is.
But the vacuum that is created by his absence, shall remain empty. We realize the worth of a person when he is not around. Such is life, and such is love for our parents.
Love you Baba. Bhalo theko.









Friday, September 9, 2011

Banchiye Rakhe - Bengali Poem


বাঁচিয়ে রাখে...

অনিশ্চিয়তা আমাকে কুঁড়ে কুঁড়ে খায়ে,
আমার প্রতিটি দিন যেন সহস্র বছর 
বন্ধ দরজা, উন্মুক্ত আকাশের লালসা 
আমাকে বাঁচিয়ে রাখে. 
পাহাড়ের গা ঘেষে এক ফালি মেঘ,
শিশির বিন্দুর কানাকানি.
ডাক টিকিটের বন্ধ খাম,
আমাকে বাঁচিয়ে রাখে. 

জীবিকার জীর্ণ রাস্তা,
অনিশ্চিয়তার রাজপ্রাসাদে 
একাকিত্বের মসনদে, নকল রাজা!
আকাঙ্খার ধংশস্তুপ পেরিয়ে 
কাঁচা মেঘের প্রথম বৃষ্টি 
আমাকে বাঁচিয়ে রাখে.
নতুন ঘাসের গন্ধ, গঙ্গার ঘোলাটে জল 
সূর্যের সান্ধ ডুব,
আমাকে বাঁচিয়ে রাখে. 

অনিশ্চিয়তা আমাকে কুঁড়ে কুঁড়ে খায়ে,
আমার প্রতিটি দিন যেন সহস্র বছর,
তভুও আমি প্রতিদিন ঘুম থেকে উঠি,
এক মুঠো টাটকা স্বপ্ন নিয়ে. 
টেলিফোনের রিংটোন, 
এক অচেনা ই-মেল,
দৈনন্দিন সাংসারিক ঝগড়া,
মাছের বাজারে দরাদরি,
আমাকে বাঁচিয়ে রাখে. 

অনিশ্চিয়তা আমাকে কুঁড়ে কুঁড়ে খায়ে,
কালকের চিন্তা, আমাকে আমার আজ-কে কেড়ে নেয়.
ডাকিনি যোগিনী আমার রাতের ঘুম,
তভুও আমি ঘুম থেকে উঠি,
কুয়াশা কাটিয়ে সুর্যোদয়ের প্রত্যাশা নিয়ে.
কফি হাউজের নির্ভেজাল আড্ডা,
নন্দন-এর রেলিঙে বসে সিনেমার কচকচানি,
রবীন্দ্র সদনের গানের জলসা 
আমাকে বাঁচিয়ে রাখে. 
শীতের বনা উল, পুজোয় মানুষের ঢল,
শালপাতায় ফুচকা, চিড়িয়াখানার পিকনিক 
আমাকে বাঁচিয়ে রাখে. 


প্রতাশার দিন, অপেক্ষার রাত 
ঘন মেঘের মত আমার বুকের ভিতর 
অন্ধকার করে আশা, যেন এক মোমের প্রদীপ 
মাস মাইনের জীবন যাপন, 
মেকি কথা, মেকি আশা, মেকি ভালবাসা 
মেকি তোমার চোখের ভাষা.
দোয়েলের ডাক, ভোরের আলো,
ফেরিওলার হাঁক, রিকশার টুঙ-টাঙ্গ
নতুন বইয়ের গন্ধ, বই মেলার ধুলো 
আমাকে বাঁচিয়ে রাখে!


অনর্গল টানাপড়েনের পর, 
হার মেনেছে অনিশ্চিয়তা, আমার কাছে! 
এক ফালি খুশি আজ আমাকে বাঁচিয়ে রাখে. 
ছাদের হুলোটা, মাঠের কাকতারুয়া,
খুড়ির চা, জগাদার তেলেভাজা,
আরসালান-এর বিরিয়ানি, ফ্লুরিস-এর কেক, 
ভাইচুন এর ফুটবল, পাড়ার নাটক 
উত্তম-সুচিত্রার প্রেম, রুদ্রাপ্রাসাদের রুদ্ধশ্বাস,
ময়দানের মিছিল, ভিক্টরিয়ার পরী,
মমতার ভাষণ, পরিবর্তেনের হাওয়া 
আমাকে বাঁচিয়ে রাখে!

Wednesday, September 7, 2011

Pankh - Hindi poem

पंख

सपनों के पंख लगाये 
बादलों को चीर 
बेहेकति नदी की तरह 
मेरी आकांक्षाएं आज उड़ रही है
सपनों के पंख लगाये,
ढूंड रही है, खुद को,
लाखों बदालों के बीच.

खुशियाँ झिलमिलाती हुई 
झर्ना की तेज़ धार जैसी 
दिल को भिगोये, उड़ रही है.
नीले आस्मां को चीर,
मेरी आकांक्षाएं आज उड़ रही है,
बुलंदी के बुलंद दरवाज़े को दस्तक 
देती हुई मेरी आकांक्षाएं, आज उड़ रही है. 

सूरज की तपती किरणों से तेज़
पर्वत के चट्टानों को चीर,
संपर्क के बेड़ियों को चीर, 
गरजती बदालों में, पंख लगाये
मेरी आकांक्षाएं आज उड़ रही है,
ना कोई रोख, ना कोई बंधन. 
सपनों की रंगोली सजाये,
किसी कवी की कविता की तरह,
किसी लेखक की सोंच की तरह, 
मेरी आकांक्षाएं आज उड़ रही है,
सपनों के पंख लगाये. 

मन जो आज स्वतंत्र है
मन जो आज स्वच्छ है,
हवा में थिरकती पतंग की डोर जैसे 
उडती हुई, पंख लगाये, तूफानों से तेज़
मेरी आकांक्षाएं आज उड़ रही है,
छूना चाहती है, आत्मविष्वास की नीव को,
मेरी आकांक्षाएं आज उड़ रही है. 
सपनों को चीर, रस्मो को चीर,
उड़ रही है.

- राम कमल मुख़र्जी 

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